आज की पोस्ट उन लड़कियों के लिए है जिनके लिए आगे बढ़ना तो दूर...आगे बढ़ने के सपने देखना भी पाप जैसा है ।।
बहुत दुख हो रहा है ये कहते हुए भी की आज भी लोग लड़को और लड़कियों में भेद करते है...
लाख बंदिश है जो उन्हें ये समझने ही नहीं देती की उन्हें भी हक है अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीने का..बिल्कुल वैसे ही जैसे उनके भाई जीते है ।।
पता नहीं लोग क्यों ये नहीं समझना चाहते कि जब भगवान ने कोई फ़र्क नहीं किया तो वो क्यों इस पाप के भागीदार बन रहे है...जीने जो इन परियों को भी अपने तरीके से.... उड़ान भरने दो इन्हे भी अपनी गति से....
और यकीन मनिए....एक दिन वो भी आएगा जब आपको इनपर नाज़ होगा ... क्योंकि ये उस मुकाम पर होंगी जहां की आपने कभी ख्वाहिश भी नहीं की होगी...
यकीन मानिए उस वक़्त आपको यकीन नहीं होगा कि ये आपकी वहीं परियां है.... जिनके हंसने पर भी आपने पाबंदियां लगाई थी।।
चलिए जिसे समझना होगा वो इतने में समझ जाएगा... बाकी जिसको ये समझ नहीं आया उनके लिए कुछ और है मेरे पास....
मैं क्या जानू आज़ादी को ,कैसे खुद को लड़का मानू
मिले ही नहीं जो पंख मुझे , कैसे फिर मैं उड़ना जानूं ।
कैसे भुला दू इस हकीकत को, कैसे सच को सपना मानू
जब आए अपने आंसू देने को,कैसे फ़िर मैं रिश्ते जानूं ।
सुकून दिया जिन फूलों में मुझे, कैसे उनको काटें मानू
हर पल जब खाई ठोकरें मैंने,कैसे फिर मैं उठना जानूं ।
दिखाए मैने जो सपने दिल को,कैसे उनको टूटा मानू
मिला ही नहीं कभी दरिया मुझे, कैसे फिर मैं प्यास को जानूं ।
भिगोया ही नहीं जिसने मुझे , कैसे उसको रिमझिम मानू
जब मिली ही नहीं मूर्त मुझे , कैसे फिर मैं पूजा जानूं ।
हर पल रुलाया जिसने मुझे, कैसे उसको अपना मानू
मिली ही नहीं कभी खुशी इस दिल को, कैसे फिर मैं हंसना जानूं ।
पाया है हर पल चार दीवारों मैं खुद को, कैसे इसको दुनिया मानू
मिला ही नहीं कभी जीवन मुझे तो , कैसे फिर मैं मौत को जानूं ।
मैं क्या जानूं आज़ादी को, कैसे खुद को लड़का मानू
मिले ही नहीं कभी पंख मुझे तो कैसे फिर मैं उड़ना जानूं।।
